विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव क्या हैं और कैसे काम करते हैं?

अगर आप बिजनेस या ट्रेडिंग करते हैं जिसमें विदेशी मुद्रा शामिल है, तो "विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव" आपके लिए जरूरी टॉपिक है। ये फाइनेंशियल टूल होते हैं जो मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के जोखिम को कम करने में मदद करते हैं। सरल शब्दों में, यह एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट होता है जो आपको भविष्य में किसी अलगे दिन किसी खास एक्सचेंज रेट पर किसी मुद्रा को खरीदने या बेचने का अधिकार या दायित्व देता है।

विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव के मुख्य प्रकार

सबसे आम रूप हैं - फार्वर्ड कॉन्ट्रैक्ट, फ्युचर्स, ऑप्शंस और स्वैप्स। फार्वर्ड कॉन्ट्रैक्ट में दो पार्टियां भविष्य की तारीख पर तय मूल्य पर मुद्रा का आदान-प्रदान करने का वादा करती हैं, जिससे एक्सचेंज रेट में बदलाव का जोखिम टाला जा सकता है।
फ्युचर्स कॉन्ट्रैक्ट भी ऐसा ही होता है लेकिन यह एक्सचेंज पर ट्रेड होता है और नियमन के तहत आता है। ऑप्शंस एक विकल्प देते हैं कि खरीदार किसी तिथि पर मुद्रा को खरीद सकता है या नहीं, जिससे फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है। स्वैप्स में दो पार्टियां नियमित अंतराल पर मुद्रा का आदान-प्रदान करती हैं।

कैसे मदद करता है विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव?

जब किसी कंपनी को भविष्य में विदेशी मुद्रा में भुगतान करना या प्राप्त करना होता है, तब बाजार के विनिमय दरों में बदलाव से नुकसान का डर रहता है। डेरिवेटिव से यह जोखिम कम हो जाता है क्योंकि लागत या आमदनी पहले से तय हो जाती है। इसका फायदा सिर्फ बड़ा बिजनेस ही नहीं, बल्कि विदेशी पैसों से जुड़े निवेशक, ट्रैवल एजेंसी, एक्सपोर्ट-इंपोर्ट करने वाले भी उठाते हैं।

कहने का मतलब ये कि विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव वित्तीय स्थिरता देने में मदद करते हैं और अनिश्चितता के बीच सटीक योजना बनाना आसान करते हैं। इसलिए यह व्यापार और निवेश की दुनिया में एक भरोसेमंद साथी की तरह काम करते हैं।

IndusInd Bank में विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव घोटाले पर ICAI ने शुरू की वित्तीय लेखा समीक्षा

IndusInd Bank में विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव घोटाले पर ICAI ने शुरू की वित्तीय लेखा समीक्षा

IndusInd Bank के विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव घोटाले में ICAI ने 2023-24 और 2024-25 के वित्तीय खातों की जांच शुरू की है। ₹2,600 करोड़ की गड़बड़ी के चलते बैंक ऑडिट और उच्च अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगे हैं, जिनकी RBI और SEBI भी जांच कर रहे हैं।

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