
ऑर्गन की कमी के चलते मरीज लंबी प्रतीक्षा सूची पर मरते रहते हैं। ऐसे में सूअर की किडनी प्रत्यारोपण एक उम्मीद बनकर उभरी है। हाँ, यह सुनने में अजीब लग सकता है, पर बात वैज्ञानिक तौर पर चल रही है और दुनिया भर में परीक्षण भी हो रहे हैं।
असल में इसे xenotransplantation कहते हैं — एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति को अंग लगाना। शोधकर्ता खास तरह के जीन-संशोधित सूअर बनाते हैं ताकि मरीज के शरीर में अंग को तेज़ी से अस्वीकृत न किया जाए। कुछ प्रमुख बदलाव में उन प्रोटीनों को हटाना शामिल है जो मानव प्रतिरक्षा तंत्र को प्रतिक्रिया देने पर उकसाते हैं।
पहले सूअर के जीन में बदलाव किए जाते हैं ताकि मानव प्रतिरक्षा प्रणाली का तीखा हमला कम हो। इसके बाद क्लिनिकल ट्रायल में अंग लगाए जाते हैं — अक्सर गंभीर मरीजों पर या ब्रेन-डेड रोगियों में पहले सैफ्टी टेस्ट किए जाते हैं। प्रत्यारोपण के बाद मरीज को इम्यूनोसप्रेसिव दवाइयाँ दी जाती हैं ताकि शरीर अंग को स्वीकार कर सके। शोधकर्ता बैक्टीरिया-वायरस और विशेषकर पोर्क से जुड़े वायरस (PERV) पर भी निगरानी रखते हैं और कई समूहों ने इन जोखिमों को कम करने के लिए जीन-एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल किया है।
फायदे साफ हैं: उपलब्धता बढ़ेगी, वेटिंग लिस्ट छोटी होगी और डायलिसिस पर निर्भरता घट सकती है। लेकिन ये तरीका अभी पूरी तरह सामान्य इलाज नहीं बना है—कठोर नियम, लंबी निगरानी और और भी कई सबूत चाहिए।
सबसे पहले फायदा उन मरीजों को होगा जिन्हें तात्कालिक अंग चाहिए और जीवित दाता या मानव अंग उपलब्ध नहीं हैं। खासकर किडनी विफलता के मरीजों के लिए यह विकल्प जीवन बदल सकता है।
जोखिम भी मौजूद हैं — तीव्र प्रतिरक्षा अस्वीकृति, लंबे समय तक इम्यूनोसप्रेसन से संक्रमण का खतरा, और जीन-संशोधित पशुओं से संभावित नए रोगों का प्रसार। साथ ही नैतिक और धार्मिक सवाल भी उठते हैं: जानवरों की भलाई, पारदर्शिता और लॉन्ग-टर्म डेटा किस तरह से संभाला जाएगा। इसलिए हर केस पर सख्त निगरानी और स्पष्ट नियमन जरूरी है।
क्या यह भारत में भी जल्द लागू होगा? शोध तेज़ है, पर व्यापक क्लिनिकल ट्रायल, रेगुलेटरी मंजूरी और स्थानीय नैतिक मंजूरियों के बिना यह आमपे लगना आसान नहीं। इसलिए अगले कुछ सालों में चरणबद्ध परीक्षण और रिपोर्ट्स देखने को मिलेंगी।
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