मुहर्रम: क्या है, क्यों मनाते हैं और कैसे शामिल हों

मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसकी दसवीं तारीख 'अशूरा' के कारण यह महीना खास माना जाता है। शिया समुदाय में यह इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत याद करने का महीना होता है, जबकि कई सुन्नी मुसलमान अशूरा का रोजा रखकर ऐतिहासिक घटनाओं को सम्मान देते हैं।

करबला की घटना (680 ईस्वी) ने मुहर्रम को बलिदान और हक के लिए खड़े होने का प्रतीक बना दिया। इमाम हुसैन के संघर्ष की वजह से यह महीना संवेदना, न्याय और याद की भावना से भर जाता है।

मुख्य परंपराएँ और व्यवहार

मुहर्रम के दौरान अलग-अलग जगहों पर अलग रिवाज देखने को मिलते हैं। शिया मजलिसें आयोजित करते हैं जहां करबला की कहानी सुनाई जाती है और शोक मनाया जाता है। जुलूस निकाले जाते हैं, तख्तियों और झंडों के साथ कतारें चलती हैं। कुछ समुदायों में मातम के रूप में छाती पीटना या श्रृंखलाओं से हल्का कड़ा करने जैसा परंपरागत अभ्यास होता है।

सुन्नी परंपरा में अशूरा के दिन का रोजा रखना आम है—ऐसा कहा जाता है कि पैगंबर मुहम्मद ने अशूरा के रोजे के महत्व की बात की थी। कई जगहों पर लंगर और मुफ्त खाने का इंतजाम होता है ताकि सभी को भोजन मिल सके। इमामबाड़े, मस्जिदें और कम्युनिटी हॉल पूरे दिन व्यस्त रहते हैं।

शांति से हिस्सा लेने के आसान तरीके

अगर आप किसी जुलूस या मजलिस में शामिल होना चाहते हैं, तो पहले आयोजकों से जानकारी लें। भीड़ में शांत रहें और आयोजकों तथा पुलिस की हिदायत मानें। तस्वीरें लेने से पहले पूछना ठीक रहता है, क्योंकि कई लोग धार्मिक भावनाओं के दौरान फोटो नहीं चाहते।

अगर आप दूसरे समुदाय से हैं, तो लंगर में जाकर भोजन लेना या मौन एवं सम्मान दिखाना अच्छा तरीका है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए आरामदायक कपड़े और पानी साथ रखें। भीड़ में बच्चों को हाथ में पकड़ कर रखें और किसी बड़े से छूटने पर तुरंत बताएं।

हरियाणा और आसपास के शहरों में राज्य प्रशासन अक्सर ट्रैफिक डायवर्जन और सुरक्षा इंतजाम करता है। लोकल न्यूज़ और पुलिस अपडेट देख लें ताकि आप समय पर निकल सकें और किसी बाधा से बचें।

मुहर्रम केवल शोक का महीना नहीं, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि जब अन्याय सामने हो तो क्या टिककर खड़े होना चाहिए। इस समय की परंपराएँ और कार्यक्रम समाज में सहानुभूति बढ़ाने का मौका देती हैं। थोड़ा सम्मान, थोड़ी समझदारी और शांत व्यवहार किसी भी जुलूस को सुरक्षित और अर्थपूर्ण बना देते हैं।

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मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है और इसका मुस्लिम समुदाय में विशेष महत्त्व है। विशेषतः शिया मुसलमान इस अवधि को इमाम हुसैन की शहादत की याद में शोक के रूप में मनाते हैं। इसमें ताज़िया बनाना, रोज़ा रखना, और दान देना शामिल है। इस लेख में कर्बला की लड़ाई का इतिहास और इस्लामी संस्कृति में इसके महत्त्व की जानकारी दी गई है।

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