
एक चौंकाने वाली बात: दुनियाभर में अंग की कमी इतनी बड़ी है कि हर साल हजारों मरीज दाताओं का इंतजार करते हुए मर जाते हैं। जेनोट्रांसप्लांटेशन (xenotransplantation) का उद्देश्य यही है — जानवरों के अंग लोगों में लगाकर इस कमी को कम करना। लेकिन यह सिर्फ तकनीक नहीं, बहस और जोखिमों का मामला भी है।
सादा शब्दों में, जेनोट्रांसप्लांटेशन में किसी जानवर (आम तौर पर सूअर) का अंग या ऊतक इंसान में प्रत्यारोपित किया जाता है। वैज्ञानिक सूअरों को जेनेटिक तौर पर बदलते हैं ताकि उनका अंग इंसानी प्रतिरक्षा तंत्र से बेहतर मेल खाए और निकाला जाने वाला संक्रमण कम हो। इसमें अंगों की जीन-संपादन, प्रतिरक्षा दबाने वाली दवाइयां और सख्त स्क्रीनिंग शामिल होती है।
आप पूछेंगे — क्या यह वही है जो क्लिक-बीट कहता है? नहीं। यह सालों की रिसर्च, प्रीक्लिनिकल टेस्ट और नैतिक-नियामक मंजूरी पर आधारित कदम है। हाल के वर्षों में कुछ सफल ट्रायल्स्स हुए हैं, लेकिन यह रोजमर्रा का इलाज नहीं बन पाया है।
फायदे सीधे हैं: अंग की उपलब्धता बढ़ेगी, इंतजार सूची घटेगी और कई जान बच सकती हैं। इसके अलावा, आपातकालीन मामलों में मदद मिल सकती है जहां मानव दाता तुरंत नहीं मिलते।
जोखिम भी कम नहीं: प्रतिरक्षण अस्वीकार, जीन-संपादन से अनपेक्षित प्रभाव, और सबसे गंभीर — पशु-मानव संक्रामक रोग का फैलना। वैज्ञानिक इस संभावना को बहुत गंभीरता से लेते हैं और बायोसेफ्टी प्रोटोकॉल बनाते हैं, पर रिस्क शून्य नहीं होता।
नैतिक सवाल भी गहरा है: क्या जानवरों के जीवन का मूल्य क्या है? क्या जनसंख्या को इससे होने वाले लाभ और जोखिम सही तरीके से बताया जा रहा है? इन सवालों पर समाज, डॉक्टर और कानून बनाते हैं — सिर्फ टेक्नोक्रेट नहीं।
भारत में स्थिति क्या है? अभी यहां व्यापक क्लीनिकल एक्सेस नहीं है। कुछ अनुसंधान और प्रयोगशालाएँ इस दिशा में काम कर रही हैं और नियामक चर्चा चल रही है। किसी भी बड़े कदम से पहले सुरक्षा, नैतिक स्वीकृति और सार्वजनिक बहस जरूरी है।
अगर आप प्रभावित हैं — मरीज या परिवार.
1) अपने डॉक्टर से खुलकर पूछें कि क्या विकल्प मौजूद हैं।
2) किसी ट्रायल में शामिल होने से पहले रेगुलेटरी स्टेटस, संभावित जोखिम और फॉलो-अप की जानकारी लें।
3) भरोसेमंद स्रोतों का ही सहारा लें — शोध पत्र, अस्पताल की जानकारी और सरकारी दिशा-निर्देश। सोशल मीडिया की अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए।
जेनोट्रांसप्लांटेशन बड़ा वादा रखता है, पर साथ में बड़े सवाल भी लाता है। यह तकनीक तभी लेकर आएगी असली फायदे, जब सुरक्षा, नैतिकता और कानून सभी मिलकर काम करें। आप क्या सोचते हैं — क्या जानवरों के अंग मानवों में लगाना सही है? चर्चा करना ज़रूरी है।