गठबंधन सरकार: क्या है, फायदे और असर

क्या गठबंधन सरकारें सिर्फ अस्थिरता लाती हैं? ये एक आम सवाल है। सच यह है कि गठबंधन सरकारें अलग-अलग स्थितियों में अलग असर देती हैं। कुछ बार वे संतुलन और सहयोग लाती हैं, तो कुछ बार फैसले धीमे और जटिल हो जाते हैं।

गठबंधन सरकार क्या होती है?

गठबंधन सरकार वह होती है जब किसी एक पार्टी को बहुमत न मिल पाने पर दो या अधिक पार्टियाँ मिलकर सरकार बनाती हैं। यह प्री-पूुल (चुनाव से पहले) या पोस्ट-पोल (चुनाव के बाद) दोनों तरह से बन सकती है। उदाहरण के तौर पर केंद्र पर लंबे समय तक UPA और NDA जैसे गठबंधनों ने काम किया। राज्यस्तर पर भी गठबंधन आम है — हरियाणा में हाल के वर्षों में गठबंधन का असर देखने को मिला है।

गठबंधन में पार्टियाँ आम तौर पर एक साझा एजेंडा, सीटों का बंटवारा और नीति पर समझौता कर लेती हैं। परंतु छोटे सहयोगी अक्सर अपनी शर्तें भी रखते हैं, जिससे फैसलों में संशोधन या देरी हो सकती है।

गठबंधन के फायदे और चुनौतियाँ

फायदे स्पष्ट हैं: बहुलवाद की आवाज़ को जगह मिलती है, छोटे क्षेत्रीय मुद्दे भी सरकार की नीतियों में शामिल हो जाते हैं, और अलग-अलग विचारधाराओं के बीच संतुलन बनता है। गठबंधन से अक्सर सामाजिक सामंजस्य और व्यापक प्रतिनिधित्व मिलता है।

चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है, कई बार नीतियाँ कमजोर समझौते बनकर रह जाती हैं। अगर सहयोगी पार्टियाँ विरोध कर दें तो सरकार हिल सकती है और स्थिरता पर असर पड़ता है। भ्रष्टाचार या पारदर्शिता के मसलों पर भी गठबंधन में जटिलताएँ बढ़ जाती हैं क्योंकि विभिन्न पार्टियों की प्राथमिकतियाँ अलग होती हैं।

आप सोच रहे होंगे कि यह सब रोज़मर्रा की ज़िन्दगी पर कैसे असर करता है? जब सरकार कमजोर होती है, तो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, निवेश और नीतिगत सुधार धीमे पड़ते हैं। वहीं, जब साझेदार सहमति से काम करते हैं, तो क्षेत्रीय विकास के लिए बेहतर संसाधन मिलते हैं।

हरियाणा जैसे राज्यों में गठबंधन का असर स्थानीय नीति, कृषि, रोजगार और विकास योजनाओं पर सीधे दिखता है। छोटे सहयोगी ग्रामीण और क्षेत्रीय मुद्दों को जोर से उठाते हैं, जिससे राज्य-केंद्र संवाद बदलता है।

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