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व्यभिचार के फैसले में हुआ लैंगिक भेदभाव !
व्यभिचार के फैसले में हुआ लैंगिक भेदभाव !
12 Jul 2018

 

नई दिल्ली: लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाले युवक-युवतियों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने एक सख्त फैसला लिया था। आपको बता दें कि व्यभिचार के मामले में कानून का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति किसी विवाहित महिला से शारीरिक संबंध बनाता है तो उसे पांच साल की कैद या जुर्माना या दोनों ही सज़ा हो सकती है। गौरतलब है कि यह बात महिलाओं के ऊपर लागू नहीं की गई है। जिसका मतलब है कि व्यभिचार में लिप्त महिला पर किसी भी तरह की सज़ा या दंड का प्रावधान कानून में नहीं है।

 

मिली जानकारी के मुताबिक बताया जा रहा है कि कानून में इस प्रारूप को लैंगिक भेद पर आधारित बताते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थी। केंद्र सरकार ने इस मसले पर अपनी राय रखते हुए अदालत से कहा है कि वो मौजूदा कानून में किसी भी प्रकार बदलाव के पक्ष में नहीं है क्योंकि यह महिलाओं के हित में नहीं होगा और इससे परिवार जैसी सामाजिक इकाई कमज़ोर पड़ सकती है।

 

बता दें कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वो व्यभिचार कानून के नाम से चर्चित आईपीसी की धारा 497 को कमजोर करने की याचिका को खारिज कर दे क्योंकि ये धारा विवाह संस्था की सुरक्षा करती है और साथ ही महिलाओं को संरक्षण भी देती है। इससे छेड़छाड़ करना भारतीय संस्कृति के लिए हितकारक साबित नहीं होगा।

 

बताया जा रहा है कि याचिकाकर्ता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि आईपीसी की धारा-497 के तहत व्यभिचार के मामले में पुरुषों को दोषी मिलने पर सजा का प्रावधान है जबकि महिलाओं को इससे छूट दी गई है। अब इस कानून पर यह कहा जा रहा है कि ऐसे में यह कानून लैंगिक भेदभाव वाला है इसलिए इस कानून को गैर संवैधानिक घोषित किया जाए।

 

इसी के साथ कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस धारा का उद्देश्य विवाह की पवित्रता को संरक्षित और सुरक्षित करना है। व्यभिचार की सजा के विलुप्त होने से वैवाहिक बंधन की पवित्रता कमजोर हो जाएगी और इसके परिणामस्वरूप वैवाहिक बंधन को मानने में लापरवाही होगी।

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